शिखर संवाद ब्यूरो बदायूं। एक तरफ बदायूं रेलवे स्टेशन को अमृत भारत बनाने के कागजी दावे हैं, तो दूसरी तरफ हकीकत में यात्री बूंद-बूंद पानी को मोहताज हैं। तीन साल से चल रहा कायाकल्प का काम कछुआ चाल से भी सुस्त है। स्टेशन पर नल तो हैं, पर वे सिर्फ नुमाइश की वस्तु बन चुके हैं। यात्रियों के गले सूख रहे हैं और विभाग चैन की नींद सोया है।
बदायूं रेलवे स्टेशन की सूरत बदलने के लिए करोड़ों के बजट वाली अमृत भारत योजना का ढिंढोरा तो खूब पीटा गया, लेकिन जमीनी हकीकत देखकर कलेजा मुंह को आता है। कायदे से अब तक प्लेटफॉर्म पर चमचमाते वॉटर बूथ लग जाने चाहिए थे, लेकिन वहां पुरानी टंकियां भी अब धूल फांक रही हैं। विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि जिस समयसीमा में स्टेशन को चमकना था, वह कब की बीत चुकी है, पर काम आज भी अधूरा है।
कई टोंटियों से आता है दूषित पानी, कई टोंटियां पड़ी बंद
स्टेशन पर पेयजल की किल्लत इस कदर है कि कुछ नलों की टोंटियां गायब हैं, तो कुछ सूखे पड़े हैं। हद तो तब हो जाती है जब इक्का-दुक्का चालू नलों से ऐसा पीला और दूषित पानी निकलता है, जिसे देखकर हाथ धोने तक का मन न करे। अपनी सेहत को दांव पर लगाकर यात्री इसी दूषित पानी से प्यास बुझाने को मजबूर हैं। क्या रेलवे प्रशासन किसी बड़ी बीमारी के फैलने का इंतजार कर रहा है। ऐसा नहीं है कि आला अधिकारियों को यह बदहाली दिखती नहीं, बल्कि विभाग जानबूझकर धृतराष्ट्र बना बैठा है। स्टेशन के नवीनीकरण के नाम पर सिर्फ तारीख पर तारीख दी जा रही है। सवाल यह उठता है कि जब मूलभूत सुविधाएं ही मुहैया नहीं कराई जा सकतीं, तो फिर अमृत भारत जैसे भारी-भरकम शब्दों का क्या अर्थ। जनता अब खोखले वादों से ऊब चुकी है और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांग रही है।
अमृत भारत योजना के नाम पर सिर्फ छलावा और कोरे वादे
करोड़ों के बजट वाली अमृत भारत योजना बदायूं स्टेशन के लिए सिर्फ कागजी शेर साबित हो रही है। जिस रफ्तार से कायाकल्प का काम चल रहा है, उससे तो स्टेशन की सूरत बदलने में सालों लग जाएंगे। पुरानी टंकियां जर्जर हो चुकी हैं और नए वॉटर बूथ का कहीं पता नहीं है। विकास के भारी-भरकम दावों के बीच आम मुसाफिर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।
सूखे नल और दूषित पानी से यात्रियों की सेहत पर बड़ा खतरा।
स्टेशन पर प्यास बुझाने के इंतजाम पूरी तरह ध्वस्त हैं। नलों से टोंटियां नदारद हैं और जहां पानी आ भी रहा है, वह इतना गंदा और पीला है कि पीने लायक नहीं। मुसाफिर मजबूरन अपनी सेहत से समझौता कर रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारी सब जानकर भी अनजान बने बैठे हैं। क्या विभाग किसी महामारी के फैलने के बाद ही अपनी गहरी नींद से जागेगा?


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